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awanish tripathi: भारतीय गणन परंपरा : प्रामाणिक और चमत्कारी

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Saturday, January 22, 2011

भारतीय गणन परंपरा : प्रामाणिक और चमत्कारी

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क्या यह संभव है कि जिस भारत ने हजारों साल पहले दुनिया को शून्य और दशमलव प्रणाली दी है, उसके पास अपना कोई अलग गणित-ज्ञान न रहा हो? जिन वेदों की गागर में अपने समय के समूचे ज्ञान-विज्ञान का महासागर भरा हो, उस में गणित-ज्ञान नाम की सरिता के लिए स्थान न बचा हो?

जर्मनी में सबसे कम समय का एक नियमित टेलीविजन कार्यक्रम है 'विसन फोर अख्त।' हिंदी में अर्थ हुआ 'आठ के पहले ज्ञान की बातें'। देश के सबसे बड़े रेडियो और टेलीविजन नेटवर्क एआरडी के इस कार्यक्रम में, हर शाम आठ बजे होने वाले मुख्य समाचारों से ठीक पहले, भारतीय मूल के विज्ञान पत्रकार रंगा योगेश्वर केवल दो मिनटों में ज्ञान-विज्ञान से संबंधित किसी दिलचस्प प्रश्न का सहज-सरल उत्तर देते हैं। ऐसे ही एक कार्यक्रम में रंगा योगेश्वर बता रहे थे कि भारत की क्या अपनी कोई अलग गणित है? वहाँ के लोग क्या किसी दूसरे ढंग से हिसाब लगाते हैं?

देखिए उदाहरण :
multiply 23 by 12:

2 3
| × |
1 2
2×1 2×2+3×1 3×2

2_____7_____6

So 23 × 12 = 276

भारत में कम ही लोग जानते हैं कि वैदिक गणित नाम का भी कोई गणित है। जो जानते भी हैं, वे इसे विवादास्पद मानते हैं कि वेदों में किसी अलग गणना प्रणाली का उल्लेख है। पर विदेशों में बहुत-से लोग मानने लगे हैं कि भारत की प्राचीन वैदिक विधि से गणित के हिसाब लगाने में न केवल मजा आता है, उससे आत्मविश्वास मिलता है और स्मरणशक्ति भी बढ़ती है। मन ही मन हिसाब लगाने की यह विधि भारत के स्कूलों में शायद ही पढ़ाई जाती है। भारत के शिक्षाशास्त्रियों का अब भी यही विश्वास है कि असली ज्ञान-विज्ञान वही है, जो इंग्लैंड-अमेरिका से आता है।


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घर का जोगी जोगड़ा
घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध। जबकि सच्चाई यह है कि इंग्लैंड-अमेरिका जैसे आन गाँव वाले भी योगविद्या की तरह ही आज भारतीय वैदिक गणित पर चकित हो रहे हैं और उसे सीख रहे हैं। उसे सिखाने वाली पुस्तकों और स्कूलों की भरमार हो गई है। बिना कागज-पेंसिल या कैल्क्युलेटर के मन ही मन हिसाब लगाने का उससे सरल और तेज तरीका शायद ही कोई है। रंगा योगेश्वर ने जर्मन टेलीविजन दर्शकों को एक उदाहरण से इसे समझायाः

'मान लें कि हमें 889 में 998 का गुणा करना है। प्रचलित तरीके से यह इतना आसान नहीं है। भारतीय वैदिक तरीके से उसे ऐसे करेंगेः दोनों का सब से नजदीकी पूर्णांक एक हजार है। उन्हें एक हजार में से घटाने पर मिले 2 और 111 । इन दोनों का गुणा करने पर मिलेगा 222 । अपने मन में इसे दाहिनी ओर लिखें। अब 889 में से उस दो को घटाएँ, जो 998 को एक हजार बनाने के लिए जोड़ना पड़ा। मिला 887। इसे मन में 222 के पहले बाईं ओर लिखें। यही, यानी 887 222, सही गुणनफल है।'

यूनान और मिस्र से भी पुराना
भारत का गणित-ज्ञान यूनान और मिस्र से भी पुराना बताया जाता है। शून्य और दशमलव तो भारत की देन हैं ही, कहते हैं कि यूनानी गणितज्ञ पाइथागोरस का प्रमेय भी भारत में पहले से ज्ञात था। लेकिन, यह ज्ञान समय की धूल के नीचे दबता गया। उसे झाड़-पोंछ कर फिर से निकाला पुरी के शंकराचार्य रहे स्वामी भारती कृष्णतीर्थजी महाराज ने 1911 से 1918 के बीच। वे एक विद्वान पुरुष थे। संस्कृत और दर्शनशास्त्र के अलावा गणित और इतिहास के भी ज्ञाता थे। सात विषयों में मास्टर्स (MA) की डिग्री से विभूषित थे। उन्होंने पुराने ग्रंथों और पांडुलिपियों का मंथन किया और निकाले वे सूत्र, जिन के आधार पर वैदिक विधि से मन ही मन हिसाब लगाये जा सकते हैं।

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विधि के विरोध के आगे विवश
लगता है कि विधि के विधान को भी गणित की वैदिक विधि के विस्तार से कुछ विरोध था। कहा जाता है कि भारती कृष्णतीर्थजी ने वैदिक गणित के 16 मूल सूत्रों की व्याख्या करने वाली 16 पुस्तकों की पांडुलिपियाँ लिखीं थीं, पर वे कहीं गुम हो गईं या नष्ट हो गईं। उन्होंने ये पांडुलिपियाँ अपने एक शिष्य को संभाल कर रखने के लिए दी थीं। उन के खोजे सूत्र अंकगणित ही नहीं, बीजगणित और भूमिति सहित गणित की हर शाखा से संबंधित थे।

अपने अंतिम दिनों में उन्होंने एक बार फिर यह भगीरथ प्रयास करना चाहा, लेकिन विधि के विधान ने एक बार फिर टाँग अड़ा दी। वे केवल एक ही सूत्र पर दुबारा लिख पाए। उन्होंने जो कुछ लिखा था और उनके शिष्यों ने उनसे जो सीखा- सुना था, उसी के संकलन के आधार पर 1965 में वैदिक गणित नाम से एक पुस्तक प्रकाशित होने वाली थी। प्रकाशन से पहले ही बीमारी के कारण उनका जीवनकाल (1884 से 1960) पूरा हो चुका था।


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पश्चिम की बढ़ती दिलचस्पी
1960 वाले दशक के अंतिम दिनों में वैदिक गणित की एक प्रति जब लंदन पहुँची, तो इंग्लैंड के जाने-माने गणितज्ञ भी चकित रह गये। उन्होंने उस पर टिप्पणियाँ लिखीं और व्याख्यान दिए। जिन्हें 1981 में पुस्तकाकार प्रकाशित किया गया। यहीं से शुरू होता है पश्चिमी देशों में वैदिक गणित का मान-सम्मान और प्रचार-प्रसार।

कुछ साल पहले लंदन के सेंट जेम्स स्कूल ने अपने यहाँ वैदिक गणित की पढ़ाई शुरू की। आज उसे भारत से अधिक इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के सरकारी और निजी स्कूलों में पढ़ाया जाता है। शिक्षक गणित को रोचक और सरल बनाने के लिए उसका सहारा लेते हैं। वैदिक विधि से बड़ी संख्याओं का जोड़-घटाना और गुणा-भाग ही नहीं, वर्ग और वर्गमूल, घन और घनमूल निकालना भी संभव है।

नासा की जिज्ञासा
ऑस्ट्रेलिया के कॉलिन निकोलस साद वैदिक गणित के भक्त हैं। उन्होंने अपना उपनाम 'जैन' रख लिया है और ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स प्रांत में बच्चों को वैदिक गणित सिखाते हैं। उनका दावा हैः 'अमेरिकी अंतरिक्ष अधिकरण नासा गोपनीय तरीके से वैदिक गणित का कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले रोबोट बनाने में उपयोग कर रहा है। नासा वाले समझना चाहते हैं कि रोबोट में आदमी के दिमाग की नकल कैसे की जा सकती है ताकि रोबोट ही दिमाग की तरह हिसाब भी लगा सके-- उदाहरण के लिए कि 96 गुणा 95 कितना हुआ....9120।'

कॉलिन निकोलस साद ने वैदिक गणित पर किताबें भी लिखी हैं। बताते हैं कि वैदिक गणित कम से कम ढाई से तीन हजार साल पुराना विज्ञान है। उस में मन ही मन हिसाब लगाने के जो16 सूत्र बताए गए हैं, वे इस विधि का उपयोग करने वाले की स्मरणशक्ति भी बढ़ाते हैं।

चमकदार प्राचीन विद्या
साद अपने बारे में कहते हैं, 'मेरा काम अंकों की इस चमकदार प्राचीन विद्या के प्रति बच्चों में प्रेम जगाना है। मेरा मानना है कि बच्चों को सचमुच वैदिक गणित सीखना चाहिए। भारतीय योगियों ने उसे हजारों साल पहले विकसित किया था। आप उनसे गणित का कोई भी प्रश्न पूछ सकते थे और वे मन की कल्पनाशक्ति से देख कर फट से जवाब दे सकते थे। उन्होंने तीन हजार साल पहले शून्य की अवधारणा प्रस्तुत की और दशमलव वाला बिंदु सुझाया। उनके बिना आज हमारे पास कंप्यूटर नहीं होता।'

साद उर्फ जैन ने मानो वैदिक गणित के प्रचार-प्रसार का व्रत ले रखा है,' मैं पिछले 25 सालों से लोगों को बता रहा हूँ कि आप अपने बच्चों के लिए सबसे अच्छा काम यही कर सकते हैं कि उन्हें वैदिक गणित सिखाएँ। इससे आत्मविश्वास, स्मरणशक्ति और कल्पनाशक्ति बढ़ती है। इस गणित के 16 मूल सूत्र जानने के बाद

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